हरियाणा की भौगोलिक संरचना – Geographical structure of Haryana

हरियाणा की भौगोलिक संरचना – Geographical struture of Haryana :-

हरियाणा प्रदेश भारत के उत्तर पश्चिम भाग में पंजाब के मैदान के दक्षिणी भाग में 27°39 उत्तरी अक्षांश से 30°55’5 उत्तरी अक्षांश तथा 74°27’8 पूर्वी देशांतर से 77°36’5 पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। हरियाणा के निकटतम राज्यों की स्थिति :
 
       उत्तर पश्चिम                       पंजाब, चंडीगढ़
       उत्तर                                हिमाचल प्रदेश
       पूर्व                                   उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड
       दक्षिणी पश्चिम                    राजस्थान
हरियाणा के पूर्व में यमुना नदी उत्तर प्रदेश व हरियाणा में सीमा निर्धारित करती हुई प्रवाहित होती है। हरियाणा भारत का भू-व्यवस्थित राज्य है, जिसका क्षेत्रफल 44212 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 1.34% है। एफ. एफ. आई. (2015) के अनुसार राज्य में वन संख्या 1584 वर्ग किलोमीटर है, जो भौगोलिक क्षेत्र का 3.59% है। कर्नल एम. एल. भार्गव के मतानुसार बहुत बाद तक भी हरियाणा के दक्षिणी भागों को समुद्र छूता रहा था।

अव्यवस्थित विन्यास :

वर्तमान हरियाणा प्रदेश राजनीतिक इकाई के रूप में संयुक्त पंजाब के 35.18% प्रतिशत भू भाग पर 1 नवंबर 1966 को अस्तित्व में आया परंतु इसकी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अति प्राचीन, सेंधव एवं वेद कालीन है। वेदों में उल्लेखित सरस्वती तथा दृषदमती नदियों के मध्य स्थित भूभाग ‘ब्रह्मवर्त’ के नाम से प्रसिद्ध था। महाप्रतापी भारतवंशी राजा जिसका नाम पर भारत राष्ट्र का नामकरण हुआ, इसी प्रदेश के निवासी रहे हैं।
सर्वप्रथम ‘हरियाणा’ शब्द का प्रयोग विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में ‘रज हरियाणे’ के रूप में हुआ जैसा कि नाम से विदित है की हरियाणा का उद्भव दो शब्दों के मेल से संभव लगता है। जैसे हरि का अरण्य, भगवान श्री कृष्ण की क्रीड़ा स्थली; ‘हरका आयन’, भगवान शिव का घर और हरित अरण्य अर्थात हरा-भरा वन। वास्तव में सर्वमान्य मत भी यहां की हरियाली से संबंधित माना जाता है। इसे अन्न की बुखारी की संज्ञा भी दी गई है।
विषमबाहु चतुर्भुज आकार धारण किए हुए इस प्रदेश का अक्षांश व देशांतरीय विस्तार लगभग 30 X 30 का है। क्षेत्रफल की दृष्टि से हरियाणा का भारत में 21वां स्थान है तथा जनसंख्या की दृष्टि से 18वा  स्थान है। इसकी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 2.09 प्रतिशत है।
 

स्थानीय संबंध :

हरियाणा प्रदेश गंगा सिंधु मैदान का उत्तर पश्चिमी हिस्सा है। गंगा सिंधु का मैदान यहां के अधिकांश भूभाग को घेरे हुए हैं। गंगा सिंधु के विशाल मैदान के विस्तार ने निकटस्थ राष्ट्रीय राजधानी एवं भारतीय राज्यों के साथ हरियाणा के परस्पर संबंधों की प्रकृतिक निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस प्रदेश के इतिहास में स्थानिक संबंध सर्व कालों में महत्वपूर्ण रहे हैं। यहां के समस्त क्षेत्र स्वर्गमय हैं जिसके कारण इस प्रदेश की सांस्कृतिक भूमिका अद्वितीय रही है। यहां पश्चिमी एशिया एवं यूरोप से आए संस्कृति धाराओं का पदार्पण संकीर्ण दरों एवं नदी घाटियों से रास्ता खोज कर हुआ है। पुरातत्ववेताओ के अनुसार लगभग 4000 वर्ष पहले सेंधव सभ्यता इस भूभग पर विद्यमान थी।
 

भौगोलिक क्षेत्र :-

भौगोलिक दृष्टि से हरियाणा को तीन इकाइयों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
 

(1) कुरुक्षेत्र :

यह क्षेत्र 28 डिग्री 30’उत्तरी अक्षांश तथा 76 डिग्री 21’से 70 डिग्री पूर्वी देशांतर के मध्य विस्तृत है। इसमें पूर्व का करनाल जिला और जींद जिले का क्षेत्रफल सम्मिलित है
 

(2) हरियाणा :

यह क्षेत्र 29 डिग्री 30’उत्तरी अक्षांश के मध्य विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में हांसी, फतेहाबाद व हिसार तहसीलें, भिवानी और रोहतक जिले के भाग सम्मिलित हैं। जाटों की अधिकता के कारण इसे जटियत क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।
 

(3) भटियाना :

यह क्षेत्र फतेहाबाद और भाटू तहसीलों के मध्य स्थित है। इस पर प्राचीन काल से भाटी राजपूतों का अधिपत्य रहा है।
 

भू-आकृति : –

हरियाणा का लगभग 93.76% भाग समतल एवं तरंगित मैदान है, जो समान्यता घग्गर-यमुना का मैदान के नाम से जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 300 मीटर से भी कम है। इस मैदान का 68.21% भाग सपाट समतल मैदान है और 25.55% भाग तरंगित तथा उर्मिला मैदान है, जिसमें बीच-बीच में पहाड़ियों के ठूंठ और रेत के टीले पाए जाते हैं। राज्य का 3.09% भाग पहाड़ी एवं चट्टानी है, जो अरावली पर्वत की अवशिष्ट पहाड़ियों के रूप में विस्तृत है। इस भाग की समुद्र तल से ऊंचाई 300 मीटर से अधिक है। राज्य के लगभग 1.67% भाग पर शिवालिक पर्वत श्रेणियां स्थित है। इसकी ऊंचाई 300 से 400 मीटर तक है। यह श्रेणियां पंचकूला, अंबाला और यमुनानगर जिलों में स्थित हैं। क्षेत्र को गिरीपाद मैदान के नाम से भी जाना जाता है।
 

शिवालिक मैदान :-

राज्य के उत्तरी पूर्वी भाग (पंचकूला, अंबाला और यमुनानगर में शिवालिक पहाड़ियों का विस्तार) है। ऊंचाई के आधार पर शिवालिक की श्रेणियों को दो भागों में बांटा जा सकता है।
1. उच्च शिवालिक श्रेणियां (600 मीटर से अधिक ऊंची)
2. निम्न शिवालिक श्रेणियां (400-600 मीटर ऊंची)
पंचकूला से 30 किलोमीटर दूर स्थित हरियाणा की सबसे ऊंची मोरनी की पहाड़ियां (Morni Hills) है। इनकी ऊंचााई समुद्र तल से 1220 मी. है। मोरनी पहाड़ियों की सर्वोच्च ऊंची चोटी करोह (Karoh,1514m) हैं।
 

गिरिपाद मैदान : –

शिवालिक श्रेणियों के दक्षिण में 25 किलोमीटर चौड़ी पट्टी के रूप में गिरिपाद मैदान यमुना नदी से घग्गर नदी तक यमुनानगर, अंबाला और पंचकूला जिलों में विस्तृत है। इस पर्वतीय मैदान को स्थानीय भाषा में “घर” (Ghar) कहा जाता है। इस मैदान कि सामान्यता: ऊंचाई 300 से 375 मीटर है। इस क्षेत्र की प्रमुख नदियोंं में घग्गर और मारकंडा नदियां शामिल हैं।
 

जलोढ़ मैदान : –

शिवालिक के गिरिपाद क्षेत्र से अरावली तक यमुना और घग्गर नदियों के मध्य विस्तृत यह उच्च भूमि जलोढ़ मैदान है, जिन्हें ‘बांगर’ (Bangar) भी कहा जाता है। समुद्र तल से इस मैदान की सामान्य ऊंचा 220 से 280 मीटर के मध्य स्थित है इस मैदानी क्षेत्र में मारकंडा, सरस्वती तथा चोटांग नदियांं हैं।
 

बालू के डिब्बे युक्त मैदान : –

यह बालू मैदान पश्चिम में हरियाणा व राजस्थान की सीमा के साथ-साथ विस्तृत है। यह मैदान सिरसा जिले के दक्षिणी भाग से प्रारंभ होकर हिसार, भिवानी, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी तथा झज्जर जिलों तक विस्तृत है। राजस्थान से आने वाली गर्म शुष्क पवनों द्वारा लगातार कच्छ की और से लाई गई बालू मिट्टी के विशेषण से विशाल क्षेत्र में ‘बालू के टिले’ का निर्माण हुआ हैं।
इन टिलों के माध्यम में निम्न स्थल ताल पाए जाते हैं, जिनमें वर्षा ऋतु में जल भर जाने से अस्थाई छिछली झीले बन जाती हैं जिन्हें ‘ठूठ या बावड़ी’ कहा जाता है।
 

अनकाई दलदल मैदान : –

हरियाणा के पश्चिमी जिले सिरसा के दक्षिणी भाग में अनकाई दलदल पाई जाती है। यह राज्य का सबसे कम ऊंचाई वाला भूभाग है, जो समुद्र तल से 200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

भू-आकृति विविधताए : –

  1. उत्तर पूर्वी भाग में शिवालिक तथा दक्षिणी एवं दक्षिण पश्चिम में अरावली की अवशिष्ट पहाड़ियां एवं बालू के टीले युक्त मैदान स्थित हैं इन दोनों के मध्य पथरीला प्रदेश, पर्वत पाद मैदान, जलोढ़ मैदान, बाढ़ का मैदान, तरंगित बालू का मैदान तथा अनकाई दलदल की भू-इकाइयां है जो मिलकर बड़े मैदान का निर्माण करती हैं। मध्य मैदानी भाग के दक्षिणी वे दक्षिणी पश्चिमी में अरावली की अपशिष्ट पहाड़ियां स्थित हैं। जिनकी ऊंचाई 300 मीटर व इससे अधिक है।
  2. उत्तर एवं पूर्व में शिवालिक पहाड़ियां तृतीय उत्थान के समय निर्मित हुई जो 400 से 900 मीटर ऊंचाई की हैं। इनकी रचना रेत, चिक्का तथा बजरी से हुई है। इन पहाड़ियों में घग्घर, मारकंडा, टांगरी तथा सरस्वती नदियां निकलती हैं।
  3. घग्घर यमुना दोआब का मैदान बहुत बड़े भूभाग को गिरे हुए हैं। शिवालिक तथा अरावली के मध्य यह जलोढ़ का मैदान है। इसका ढलान मंद है जो उत्तर-पूर्वी से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 220 से 280 मीटर है। इस क्षेत्र में मारकंडा, सरस्वती, चोतांग नदियां बहती हैं।
  4. यमुना नदी हरियाणा के पूर्वी किनारे पर यमुनानगर से फरीदाबाद तक बाढ़ के मैदान का निर्माण करती है। यह तरंगित मैदान है। उत्तर-पश्चिमी भागों में घग्घर तथा मारकंडा भी इसी तरह बाढ़ के मैदान का निर्माण करती रहती हैं।
  5. राजस्थान की सीमा के साथ लगता दक्षिण-पश्चिमी भाग बालूमय मैदान है। यह सिरसा जिले के दक्षिणी भागों से शुरू होकर फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी और झज्जर जिलों तक फैला हुआ है। हरियाणा के इस क्षेत्र में मरुस्थल के प्रसार को रोकने के लिए हरी पट्टी का निर्माण किया गया है ताकि बालू रेत के विस्तार को रोका जा सके।

जलवायु संबंधित विविधताए : –

महाद्वीपीय स्थिति, उत्तर-पश्चिमी विक्षोभ एवं दक्षिण-पश्चिमी मानसून जलवायु का निर्धारण करते हैं। कुछ विषमताओं के महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं —
राज्य की सामान्य वर्षा 300 मिलीलीटर (दक्षिणी-पश्चिमी भू-भाग) से 1100 मिलीलीटर (शिवालिक की पहाड़ियों) तक होती है।
सामान्यता: गर्मियों में आने वाले दिन का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तथा सर्दियों में रात का तापमान 0 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है। तापमान में यह भीषणता दक्षिणी पश्चिमी भागों में अधिक प्रभावशाली है। प्रदेश में शुष्क, अरधशुष्क तथा उष्णकटिबंधीय जलवायु क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर पाई जाती है। कुल वर्षा का 80% भाग जुलाई से सितंबर के मध्य तथा 10-15 प्रतिशत भाग पश्चिमी विक्षोभों के कारण जनवरी से मार्च के मध्य होता है।
 

उष्ण कटिले वन :-

यह वन महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, गुडगांव, भिवानी, यमुनानगर, कैथल, करनाल, हिसार और सोनीपत के मैदानी भाग में पाए जाते हैं जहां ऑस्त वर्षा 20 से 40 सेंटीमीटर होती है। इसमें शीशम, नीम, पीपल, बड, लसोड़ा, जामुन, इमली सहजन तथा सेमल आदि वृक्षों की बहुतायतता रहती है।
 

उपोषण चीड़ वन : –

अंबाला, पंचकूला, यमुनानगर, और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र में पाइन वन मिलते हैं। जहां औसत वर्षा 100 सेंटीमीटर के आसपास होती है। यहां चीड़, पाइन वृक्षों की बहुतायतता होती है। इसके अतिरिक्त चीड़, कचनार, अमलतास, जामुन, महुआ, बहेड़ा, तनु आदि वृक्ष भी होते हैं।
 

मिट्टी की विविधता : –

  1. हरियाणा की संपन्नता उपजाऊ मिट्टी, समतल धरातल,सुदृढ़ संचार व्यवस्था तथा कृषि अनुकूल जलवायु पर निर्भर है। केवल उत्तर तथा दक्षिण की पहाड़ियों को छोड़ समस्त क्षेत्र की मिट्टी लगभग उपजाऊ किसम की है।
  2. धरातलीय बनावट के आधार पर तीन प्रकार के मिट्टी क्षेत्र हैं– पहाड़ी, मैदानी एवं रेतीला। पहाड़ी क्षेत्र के साथ पर्वत पदीय मैदान जहां बालू, बजरी तल, रेतमय आदि ने मन कोटी की मिट्टी है। नारायणगढ़ तथा कालका तहसील में ऐसे मिट्टी युक्त भू-क्षेत्र को “घाहर” तथा जगाधरी में “कंडी” के नाम से पुकारा जाता है।
  3. मरुस्थली सीमा के साथ सिरसा से नारनौल तक बालूका प्रधान दोमट मिट्टी पाई जाती है। यहां वायु द्वारा मिट्टी का अपरदन होता है यह मोटे अनाज के लिए उपयुक्त है। यहां पर शुष्क कृषि पद्धति अपनाएं जाती है।
  4. उपरोक्त दोनों मिट्टियों के मध्य जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। प्रमुख खाद्यान्न फसलों में गेहूं और धान तथा अन्य में कपास तथा गन्ना आदि फसलें उगाई जाती हैं। नदियों के साथ साथ खादर तथा किनारों से दूर बांगर में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।

हरियाणा में वर्षा :-

पूर्वी मंडल : – 

  1. इस मंडल में पंचकूला, अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, पानीपत, सोनीपत, फरीदबाद, मेवात तथा पलवल जिलों के अलावा कुछ भाग जींद, रोहतक, झज्जर व गुड़गांव जिले का भी शामिल है। जो कि प्रांत का लगभग 49 प्रतिशत भू भाग है। इस भाग को अधिक नमी वाला भूभाग भी कहा जाता है, जहां वर्ष भर में सामान्य वर्षा 500 से 1000 मिलीलीटर के बीच होती है।
  2. वर्ष में लगभग 75-80% से अधिक वर्ष जुलाई से सितंबर के महीने में होती है। शेष 10% वर्षा ग्रीष्म ऋतु एवं 10 – 15% शीत ऋतु में होती है। साल भर में सामान्यतः 30 दिन तक 20 से 30 मिलीलटर वर्षा मापी गई है। चक्रवती अर्थात पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा की दैनिक ओस्त 8 से 14 मिलीलीटर, दक्षिण पश्चिमी क्षेत्रों से लेकर उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में मापी गई है।
  3. सामान्यता: मई-जून के महीने गर्म एवं दिसंबर जनवरी के महीने ठंडे रहते हैं। वर्ष भर में 8 से 10 महीने सामान्य तापमान 20 डिग्री के आसपास रहता है। जो कि मई जून के महीने में 40 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक हो जाता है।

पश्चिमी मंडल : –

  1. पश्चिमी मंडल में सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, भिवानी, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी जिलों के अलावा जींद, झज्जर, रोहतक एवं गुड़गांव जिलों का शेष भूभाग सम्मिलित है। क्षेत्र में दक्षिण पश्चिम मानसून हवाएं (जुलाई से सितंबर) वर्ष भर की लगभग 80 से 85% वर्षा लाती है। अक्टूबर से मध्य अप्रैल के दौरान मौसम आम तौर पर शुष्क रहता है। दक्षिणी पश्चिमी हरियाणा का अधिकतर भूभाग शुष्क क्षेत्र की श्रेणी में गिना जाता है। जहां पर सामान्य वार्षिक वर्षा 400 मिलीलीटर से भी कम होती है।
  2. गुड़गांव ए महेंद्रगढ़ जिला के भूभग अर्ध शुष्क क्षेत्रों की श्रेणी में गिने जाते हैं। यहां पर सामान्य वार्षिक वर्षा 400 से 500 मिली मीटर तक आंकी गई है। तथा सबसे कम सामान्य वार्षिक वर्षा (300 मिली मीटर से भी कम) भिवानी जिले के लोहारू में आंकी गई है। वर्ष भर में खुले पेन से कुल वाष्पीकरण लगभग 2600 मिलीमीटर रखा गया है। जून माह में वाष्पीकरण की दैनिक दर 14 मिलीमीटर से भी ज्यादा होती है।

Note :-

अत्यधिक वर्षा के कारण यमुनानगर के छछरौली को हरियाणा में चेरापूंजी के नाम से जाना जाता है।
हरियाणा में जुलाई सितंबर के मध्य दक्षिण पश्चिमी मानसून पवनों के द्वारा वर्षा होती है।
हरियाणा में सबसे कम वर्षा दक्षिण पश्चिम (अरावली) क्षेत्र में लगभग 25 से 28 सेंटीमीटर होती है 
तथा उत्तर पूर्वी भाग में सबसे अधिक वर्षा होती है।

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